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जहरमोहरा भस्म एवं पिष्टी: परिचय, शोधन, निर्माण विधि, पारंपरिक गुण एवं उपयोग

Oct 03, 2026
जड़ी बूटियों से चिकित्सा
जहरमोहरा भस्म एवं पिष्टी: परिचय, शोधन, निर्माण विधि, पारंपरिक गुण एवं उपयोग

परिचय

जहरमोहरा भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में वर्णित एक खनिज/पत्थर पदार्थ है, जिसका उल्लेख विशेष रूप से यूनानी चिकित्सा साहित्य में मिलता है। इसका रंग सामान्यतः सफेद, हल्का पीला अथवा कुछ हरापन लिए हुए बताया गया है। पारंपरिक रूप से इसे यूनानी दवा विक्रेताओं के यहां “जहरमोहरा” नाम से प्राप्त किया जाता रहा है। यूनानी हकीमों द्वारा इसके विभिन्न रूपों का प्रयोग किए जाने का उल्लेख मिलता है और समय के साथ आयुर्वेदिक चिकित्सा परंपरा में भी इसके उपयोग का वर्णन मिलता है।

पुराने ग्रंथों में जहरमोहरा को विशेष गुणों वाला पदार्थ माना गया है। इसके अच्छे नमूने को वजन में हल्का, चिकना तथा अच्छी बनावट वाला बताया गया है। कुछ क्षेत्रों में इसके टुकड़ों को विशेष आकार देकर और घिसाई करके “जहरमोहरा खताई” के नाम से भी बेचा जाता था। हालांकि पारंपरिक ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि केवल घिसाई या आकार बदलने से इसके मूल गुणों में विशेष परिवर्तन आवश्यक नहीं होता।

जहरमोहरा का उपयोग मुख्यतः भस्म और पिष्टी के रूप में वर्णित है। भस्म निर्माण में शोधन के बाद अग्नि-संस्कार की प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है, जबकि पिष्टी बनाने के लिए इसके सूक्ष्म चूर्ण को गुलाबजल या अन्य द्रव माध्यम के साथ लंबे समय तक घोंटकर महीन बनाया जाता है।

यह लेख मुख्यतः पारंपरिक ग्रंथीय विवरण, निर्माण-विधि, मात्रा, अनुपान तथा वर्णित उपयोगों का व्यवस्थित परिचय प्रस्तुत करता है। इन विधियों को आधुनिक चिकित्सा में प्रमाणित उपचार के रूप में नहीं समझना चाहिए।


जहरमोहरा का स्वरूप एवं पहचान

परंपरागत विवरण के अनुसार जहरमोहरा एक प्रकार का पत्थर है जिसका रंग सफेद, पीला-सफेद अथवा हल्का हरा दिखाई दे सकता है। इसकी गुणवत्ता का आकलन पुराने वैद्य और हकीम इसके रंग, बनावट, चिकनाई और हल्के वजन जैसे गुणों के आधार पर करते थे।

पारंपरिक बाजार में जहरमोहरा के विभिन्न आकार के टुकड़े मिलते रहे हैं। दिल्ली और अमृतसर के व्यापारियों द्वारा इसके टुकड़ों को चौकोर आकार देकर विशेष रूप से घिसकर “जहरमोहरा खताई” के नाम से बेचने का उल्लेख पुराने साहित्य में मिलता है।

हालांकि किसी खनिज पदार्थ की वास्तविक पहचान केवल नाम, रंग या पारंपरिक बाजार की पहचान के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। आधुनिक समय में किसी भी खनिज-आधारित औषधीय पदार्थ की पहचान और शुद्धता के लिए विशेषज्ञ परीक्षण तथा प्रमाणित स्रोत महत्वपूर्ण हैं।


जहरमोहरा के प्रमुख रूप

पारंपरिक चिकित्सा साहित्य में जहरमोहरा मुख्यतः दो रूपों में वर्णित है:

  1. जहरमोहरा भस्म
  2. जहरमोहरा पिष्टी

दोनों के निर्माण की प्रक्रिया अलग-अलग बताई गई है।

भस्म में शोधन के बाद अग्नि-संस्कार किया जाता है, जबकि पिष्टी में बिना अग्नि-संस्कार के सूक्ष्म चूर्ण को द्रव माध्यम के साथ लंबे समय तक घोंटने की प्रक्रिया का वर्णन मिलता है।

यूनानी परंपरा में पिष्टी को कई बार भस्म की तुलना में अधिक उपयोगी माना गया है। पुराने ग्रंथों में कुछ वैद्यों द्वारा भस्म के स्थान पर पिष्टी के प्रयोग का भी उल्लेख मिलता है।


जहरमोहरा का शोधन

पुराने ग्रंथों में जहरमोहरा के औषधीय प्रयोग से पहले उसका शोधन करने की विधि बताई गई है।

पारंपरिक विधि के अनुसार जहरमोहरा को अग्नि में गर्म करके बार-बार किसी उपयुक्त द्रव में बुझाया जाता है। दिए गए ग्रंथीय विवरण में इसे 21 बार गोदुग्ध या आंवले के रस में बुझाने का उल्लेख मिलता है।

इस प्रक्रिया को पारंपरिक शोधन प्रक्रिया माना जाता है।

पारंपरिक शोधन विधि

ग्रंथीय विवरण के अनुसार:

  • जहरमोहरा के उपयुक्त टुकड़े लिए जाते हैं।
  • उन्हें अग्नि में गर्म किया जाता है।
  • गर्म किए हुए पदार्थ को गोदुग्ध अथवा आंवले के रस में बुझाया जाता है।
  • इस प्रक्रिया को 21 बार दोहराने का उल्लेख मिलता है।
  • इसके बाद पदार्थ को शुद्ध माना जाता है।

महत्वपूर्ण सावधानी

यह एक पारंपरिक औषधीय निर्माण प्रक्रिया है। खनिज पदार्थ को गर्म करने, बुझाने और औषधीय रूप में सेवन करने से पहले उसकी वास्तविक रासायनिक पहचान, शुद्धता तथा संभावित अशुद्धियों की जांच आवश्यक है। घर पर इस प्रकार की भस्म तैयार करना सुरक्षित नहीं माना जाना चाहिए।


जहरमोहरा भस्म बनाने की पारंपरिक विधि

शोधन के बाद जहरमोहरा को भस्म के रूप में तैयार करने की विधि का भी वर्णन मिलता है।

ग्रंथीय विधि के अनुसार शुद्ध किए गए जहरमोहरा का बारीक चूर्ण तैयार किया जाता है। इस चूर्ण को गोदुग्ध में लंबे समय तक खरल किया जाता है।

लगभग छह घंटे तक खरल करने के बाद इसकी टिकिया बनाई जाती है। टिकिया को सुखाने के बाद इसे पारंपरिक सम्पुट में बंद करके गजपुट में अग्नि-संस्कार करने का उल्लेख मिलता है।

इस प्रक्रिया के बाद प्राप्त पदार्थ को जहरमोहरा भस्म कहा जाता है।

पारंपरिक क्रम

शोधन → सूक्ष्म चूर्ण → गोदुग्ध में खरल → टिकिया निर्माण → सुखाना → सम्पुट → गजपुट → भस्म

भस्म निर्माण में तापमान, अवधि, पात्र, ईंधन और प्रक्रिया की सही परिस्थितियां अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। इसलिए पारंपरिक भस्म निर्माण प्रशिक्षित विशेषज्ञ की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।


जहरमोहरा पिष्टी क्या है?

जहरमोहरा पिष्टी जहरमोहरा का एक सूक्ष्म चूर्ण रूप है जिसे पारंपरिक रूप से गुलाबजल या अन्य उपयुक्त द्रव के साथ लंबे समय तक घोंटकर तैयार किया जाता है।

पिष्टी निर्माण में सामान्यतः अग्नि-संस्कार का प्रयोग नहीं किया जाता। इसका उद्देश्य पदार्थ को अत्यंत महीन और समरूप बनाना होता है।

पारंपरिक पिष्टी विधि

उत्तम गुणवत्ता वाले जहरमोहरा के टुकड़े लेकर उन्हें पानी से धोया जाता है और सुखाया जाता है। इसके बाद इन्हें बारीक चूर्ण में परिवर्तित किया जाता है।

चूर्ण को कपड़े से छानकर और अधिक महीन किया जाता है। इसके बाद इसे खरल में लेकर गुलाबजल या पारंपरिक रूप से बताए गए अन्य अर्क के साथ अच्छी तरह घोंटा जाता है।

लगातार घोंटने से चूर्ण अत्यंत महीन और चिकना हो जाता है। इसके बाद इसे सुखाया जाता है।

इस प्रकार तैयार पदार्थ को जहरमोहरा पिष्टी कहा जाता है।


जहरमोहरा भस्म और पिष्टी में अंतर

जहरमोहरा भस्म और पिष्टी एक ही मूल पदार्थ से संबंधित होने के बावजूद उनकी निर्माण प्रक्रिया अलग होती है।

आधारजहरमोहरा भस्मजहरमोहरा पिष्टी
मूल पदार्थजहरमोहराजहरमोहरा
शोधनपारंपरिक शोधनपारंपरिक शोधन/सफाई
मुख्य प्रक्रियाअग्नि-संस्कारखरल द्वारा महीन करना
अग्नि प्रयोगहोता हैसामान्यतः नहीं
माध्यमगोदुग्ध आदिगुलाबजल आदि
अंतिम रूपभस्मअत्यंत महीन पिष्टी

पुराने यूनानी साहित्य में पिष्टी को कई परिस्थितियों में भस्म से अधिक गुणकारी माना गया है। हालांकि आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से दोनों की सुरक्षा और प्रभाव का मूल्यांकन अलग-अलग किया जाना आवश्यक है।


पारंपरिक मत के अनुसार जहरमोहरा के गुण

पारंपरिक चिकित्सा साहित्य में जहरमोहरा को मातदिल, अर्थात न अधिक गर्म और न अधिक ठंडा, बताया गया है।

इसी कारण पुराने चिकित्सकीय मत के अनुसार इसे विभिन्न प्रकृति वाले व्यक्तियों के लिए उपयोगी माना गया।

ग्रंथीय विवरण में इसके निम्न पारंपरिक गुणों का उल्लेख मिलता है:

  • हृदय को बल देने वाला
  • मस्तिष्क के लिए बलवर्धक
  • पित्त को शांत करने वाला
  • शरीर को बल प्रदान करने वाला
  • पारंपरिक रूप से विषघ्न माना गया
  • पाचन संबंधी कुछ विकारों में उपयोगी माना गया
  • कमजोरी की स्थितियों में उपयोग का उल्लेख
  • बच्चों से संबंधित कुछ पारंपरिक चिकित्सा योगों में उपयोग

इन सभी गुणों को पारंपरिक चिकित्सा साहित्य में वर्णित गुण के रूप में समझना चाहिए, न कि आधुनिक चिकित्सकीय रूप से सिद्ध प्रभाव के रूप में।


पारंपरिक रूप से बताए गए उपयोग

पुराने ग्रंथों में जहरमोहरा भस्म और पिष्टी के अनेक उपयोगों का वर्णन मिलता है। इनमें दाह, अतिसार, जीर्ण ज्वर, हृदय की घबराहट, यकृत संबंधी विकार और कमजोरी आदि का उल्लेख किया गया है।

कुछ ग्रंथों में इसे बच्चों के दस्त तथा शोष जैसी पारंपरिक रूप से वर्णित अवस्थाओं में भी उपयोगी बताया गया है।

हालांकि आधुनिक चिकित्सा में दस्त, बुखार, यकृत संबंधी रोग, हृदय संबंधी लक्षण या बच्चों में कमजोरी के अनेक गंभीर कारण हो सकते हैं। इसलिए ऐसे लक्षणों में चिकित्सकीय जांच आवश्यक है।


जहरमोहरा और विष संबंधी पारंपरिक मान्यता

जहरमोहरा के नाम और पारंपरिक उपयोगों से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण विषय इसका विषघ्न माना जाना है।

पुराने यूनानी ग्रंथों में इसे विभिन्न प्रकार के विषों के प्रभाव को कम करने वाला बताया गया है। सांप, बिच्छू, अफीम आदि के विष संबंधी उपद्रवों में इसके प्रयोग का उल्लेख मिलता है।

कुछ पुराने ग्रंथों में इसे पानी में घिसकर देने तथा वमन होने के माध्यम से विष के प्रभाव को कम करने की बात कही गई है।

आधुनिक सुरक्षा दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण

सांप या बिच्छू के काटने, जहरीले पदार्थ के सेवन या किसी विषाक्तता की स्थिति में जहरमोहरा अथवा किसी अन्य पारंपरिक औषधि को प्राथमिक उपचार के रूप में प्रयोग करना सुरक्षित विकल्प नहीं है।

ऐसी स्थिति में तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता प्राप्त करनी चाहिए। उल्टी करवाना भी कई प्रकार के विषों में खतरनाक हो सकता है।

इसलिए पुराने ग्रंथ में वर्णित विषघ्न उपयोग को ऐतिहासिक/पारंपरिक जानकारी के रूप में पढ़ना चाहिए।


ज्वर और पाचन संबंधी पारंपरिक उपयोग

कुछ पुराने ग्रंथों में जहरमोहरा को जीर्ण ज्वर तथा अतिसार जैसी स्थितियों में उपयोगी बताया गया है।

पारंपरिक चिकित्सा में इसे शरीर को संतुलित करने और कमजोरी कम करने वाला पदार्थ माना गया। दूषित जल या वातावरण से होने वाले ज्वर, अतिसार, संग्रहणी तथा शरीर की कमजोरी में इसके उपयोग का उल्लेख मिलता है।

आज के संदर्भ में दूषित पानी से होने वाले दस्त और संक्रमणों में सबसे महत्वपूर्ण बात पर्याप्त तरल पदार्थ, ORS तथा आवश्यकता के अनुसार चिकित्सकीय उपचार है।


संक्रामक रोगों के संबंध में पारंपरिक विवरण

पुराने ग्रंथों में प्लेग, हैजा, मलेरिया और चेचक जैसे संक्रामक रोगों के समय जहरमोहरा पिष्टी के कुछ मिश्रित योगों का वर्णन किया गया है।

एक पारंपरिक योग में जहरमोहरा पिष्टी और निर्मली बीज चूर्ण को गुलाबजल के साथ देने का उल्लेख मिलता है।

इसी प्रकार हैजा के संदर्भ में जहरमोहरा पिष्टी को मयूरपंख भस्म के साथ मिलाकर देने का विवरण मिलता है।

आधुनिक चिकित्सा में सावधानी

हैजा, मलेरिया, प्लेग और अन्य गंभीर संक्रामक रोगों में केवल पारंपरिक औषधियों पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है। हैजा में तेजी से निर्जलीकरण हो सकता है और समय पर ORS, IV fluids तथा चिकित्सकीय उपचार की आवश्यकता पड़ सकती है।

चेचक यानी smallpox के संबंध में भी आधुनिक संदर्भ महत्वपूर्ण है। दुनिया में प्राकृतिक smallpox को समाप्त घोषित किया जा चुका है, इसलिए पुराने ग्रंथ में वर्णित चेचक संबंधी उपचार को आधुनिक चिकित्सा सलाह नहीं माना जाना चाहिए।


जहरमोहरा और बच्चों से संबंधित पारंपरिक उपयोग

पुराने ग्रंथों में जहरमोहरा पिष्टी का उपयोग बच्चों की कुछ अवस्थाओं में भी बताया गया है। विशेष रूप से “सूखा रोग” के लिए जहरमोहरा पिष्टी को बंशलोचन, छोटी इलायची चूर्ण और प्रवाल पिष्टी के साथ देने का उल्लेख मिलता है।

पुराने साहित्य में इसे अत्यंत लाभकारी बताया गया है।

लेकिन बच्चों में कमजोरी, कम वजन, हड्डियों की समस्या, दस्त, विकास में कमी या पोषण संबंधी समस्या होने पर आधुनिक चिकित्सा में कारण का पता लगाना आवश्यक है। Vitamin D deficiency, calcium deficiency, malnutrition, संक्रमण या अन्य रोग इसके पीछे हो सकते हैं।

इसलिए बच्चों को खनिज-आधारित भस्म या पिष्टी बिना योग्य चिकित्सक की सलाह के नहीं देनी चाहिए।


रक्तचाप के संदर्भ में पारंपरिक उल्लेख

पुराने साहित्य में रक्तचाप बढ़ने के साथ सिर में भारीपन, आंखों में लाली और घबराहट जैसे लक्षणों का उल्लेख करते हुए जहरमोहरा खताई पिष्टी को सोडा बाईकार्ब और गुलकंद के साथ प्रयोग करने का वर्णन मिलता है।

यह एक पारंपरिक चिकित्सा विवरण है।

आधुनिक चिकित्सा में उच्च रक्तचाप की पुष्टि रक्तचाप मापने से होती है और इसका उपचार व्यक्ति की स्थिति के अनुसार किया जाता है। केवल सिर भारी होना या घबराहट होना उच्च रक्तचाप का निश्चित प्रमाण नहीं है।

यदि रक्तचाप बहुत अधिक हो और साथ में सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी, तेज सिरदर्द, कमजोरी, बोलने में परेशानी या दृष्टि में बदलाव जैसे लक्षण हों तो तत्काल चिकित्सा सहायता आवश्यक है।


पारंपरिक मात्रा और अनुपान

पुराने ग्रंथ में जहरमोहरा भस्म या पिष्टी की मात्रा 1 से 2 रत्ती, दिन में 2 से 4 बार तक बताई गई है। साथ में शहद, मौसम्बी का रस, अनार का रस, खमीरा गाजवान, दाडिमावलेह या गाय के दूध जैसे विभिन्न अनुपानों का उल्लेख मिलता है।

हालांकि रत्ती जैसी पारंपरिक माप आधुनिक ग्राम माप से अलग ऐतिहासिक संदर्भ रखती है और अलग ग्रंथों में माप की व्याख्या भी भिन्न हो सकती है।

इसलिए इस ऐतिहासिक मात्रा को देखकर स्वयं सेवन करना उचित नहीं है। विशेष रूप से खनिज/धातु आधारित पारंपरिक औषधियों की मात्रा व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, अन्य दवाओं और पदार्थ की शुद्धता के अनुसार विशेषज्ञ द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।


जहरमोहरा के बारे में पारंपरिक मान्यताएं

जहरमोहरा को लेकर पारंपरिक चिकित्सा साहित्य में कई महत्वपूर्ण मान्यताएं मिलती हैं। इसे शरीर के विभिन्न अंगों को बल देने वाला, पित्त को शांत करने वाला तथा विष के प्रभाव को कम करने वाला माना गया।

हृदय, मस्तिष्क और पाचन तंत्र के लिए भी इसके उपयोग का उल्लेख मिलता है।

कुछ ग्रंथों में इसे कमजोर व्यक्तियों और बच्चों के लिए विशेष रूप से लाभकारी बताया गया है।

लेकिन किसी भी पारंपरिक दावे को आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। पारंपरिक चिकित्सा का अध्ययन करते समय ग्रंथीय दावे और आधुनिक चिकित्सकीय प्रमाणों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।


जहरमोहरा पिष्टी की पारंपरिक विशेषता

जहरमोहरा पिष्टी की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी अत्यंत महीन बनावट मानी जाती है।

पारंपरिक पिष्टी निर्माण में चूर्ण को कपड़छन करने के बाद गुलाबजल जैसे द्रव के साथ लगातार घोंटा जाता है। इसका उद्देश्य चूर्ण को अधिक से अधिक सूक्ष्म और समरूप बनाना होता है।

यूनानी चिकित्सा परंपरा में पिष्टी को कई बार कोमल और आसानी से उपयोग किए जाने वाले रूप के रूप में देखा गया है।

फिर भी इसकी वास्तविक गुणवत्ता का निर्धारण केवल बाहरी रूप से नहीं किया जा सकता। स्रोत, पहचान, शुद्धता और निर्माण प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं।


जहरमोहरा खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखें?

यदि कोई व्यक्ति शोध, पारंपरिक अध्ययन या प्रमाणित चिकित्सा निर्माण के उद्देश्य से जहरमोहरा खरीदना चाहता है, तो निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए:

  • पदार्थ प्रमाणित स्रोत से प्राप्त हो।
  • उसकी वास्तविक पहचान सुनिश्चित हो।
  • अशुद्धियों की जांच की गई हो।
  • खनिज संरचना की जानकारी उपलब्ध हो।
  • निर्माण और शोधन प्रक्रिया प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा की गई हो।
  • तैयार उत्पाद की गुणवत्ता जांच उपलब्ध हो।
  • पैकेजिंग पर निर्माता और बैच की जानकारी स्पष्ट हो।
  • चिकित्सकीय उपयोग के लिए योग्य विशेषज्ञ की सलाह ली जाए।

केवल बाजार में उपलब्ध किसी पत्थर को जहरमोहरा मानकर औषधीय प्रयोग करना उचित नहीं है।


निष्कर्ष

जहरमोहरा भस्म और जहरमोहरा पिष्टी का वर्णन भारतीय तथा यूनानी पारंपरिक चिकित्सा साहित्य में मिलता है। जहरमोहरा को एक विशेष प्रकार के पत्थर के रूप में वर्णित किया गया है और इसके शोधन, भस्म निर्माण तथा पिष्टी निर्माण की अलग-अलग पारंपरिक विधियां बताई गई हैं।

पारंपरिक ग्रंथों में इसे हृदय एवं मस्तिष्क को बल देने वाला, पित्त को शांत करने वाला, शरीर को बल प्रदान करने वाला तथा विषघ्न माना गया है। दाह, अतिसार, जीर्ण ज्वर, कमजोरी और अन्य अनेक स्थितियों में इसके उपयोग का उल्लेख मिलता है।

जहरमोहरा पिष्टी के निर्माण में इसके महीन चूर्ण को गुलाबजल आदि के साथ लंबे समय तक घोंटने की प्रक्रिया बताई गई है, जबकि भस्म निर्माण में शोधन के बाद अग्नि-संस्कार का उल्लेख मिलता है।

हालांकि इन सभी उपयोगों को पारंपरिक चिकित्सा साहित्य का हिस्सा समझना आवश्यक है। आधुनिक वैज्ञानिक चिकित्सा में किसी भी रोग, विशेषकर विषाक्तता, हैजा, गंभीर संक्रमण, उच्च रक्तचाप या बच्चों की बीमारी के उपचार के लिए केवल जहरमोहरा भस्म या पिष्टी पर निर्भर नहीं किया जाना चाहिए।

खनिज-आधारित औषधियों में पदार्थ की पहचान, शुद्धता, निर्माण प्रक्रिया और संभावित अशुद्धियों की जांच विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसलिए इसका चिकित्सकीय उपयोग केवल योग्य एवं प्रशिक्षित आयुर्वेदिक/यूनानी चिकित्सक की सलाह तथा उचित गुणवत्ता वाले उत्पाद के साथ ही किया जाना चाहिए।

नोट: यह लेख पारंपरिक ग्रंथीय जानकारी को शैक्षणिक और ऐतिहासिक संदर्भ में प्रस्तुत करता है। यह किसी बीमारी के निदान, उपचार या आपातकालीन चिकित्सा का विकल्प नहीं है। विषाक्तता, गंभीर दस्त, तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी, अत्यधिक रक्तचाप या किसी गंभीर बीमारी की स्थिति में तत्काल योग्य चिकित्सकीय सहायता लें।

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