एक्जीमा (छाजन/पामा) का आयुर्वेदिक इलाज: कारण, लक्षण और प्रभावी उपचार

Jun 06, 2026
बीमारियां कारण,लक्षण एवं उपचार
एक्जीमा (छाजन/पामा) का आयुर्वेदिक इलाज: कारण, लक्षण और प्रभावी उपचार

त्वचा हमारे शरीर का सबसे बड़ा अंग है, जो हमें बाहरी संक्रमण, धूल, गर्मी, सर्दी और अन्य हानिकारक तत्वों से सुरक्षा प्रदान करती है। आयुर्वेद में त्वचा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि यह केवल शरीर की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि हमारे स्वास्थ्य और सौंदर्य का भी दर्पण होती है।

जब त्वचा में दोषों का असंतुलन हो जाता है, तब अनेक त्वचा रोग उत्पन्न हो सकते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख रोग है एक्जीमा (Eczema), जिसे आयुर्वेद में पामा, छाजन, चम्बल, अकौता, अपरस या पानीवात के नाम से भी जाना जाता है।

एक्जीमा कोई जानलेवा बीमारी नहीं है, लेकिन यह लगातार खुजली, जलन और त्वचा की खराब स्थिति के कारण व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से काफी परेशान कर सकती है।


एक्जीमा क्या है?

एक्जीमा एक त्वचा संबंधी विकार है जिसमें त्वचा पर लालिमा, खुजली, सूजन, छोटे-छोटे दाने, फफोले और कभी-कभी पानी या पस निकलने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

समय रहते उपचार न मिलने पर त्वचा मोटी, काली और रूखी हो सकती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसे Eczematous Dermatitis कहा जाता है।


एक्जीमा के प्रमुख लक्षण

एक्जीमा के लक्षण रोग की अवस्था और प्रकार के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

प्रारंभिक लक्षण

  • त्वचा पर लाल चकत्ते दिखाई देना
  • तीव्र खुजली होना
  • प्रभावित स्थान पर जलन महसूस होना
  • त्वचा का संवेदनशील हो जाना

रोग बढ़ने पर

  • छोटे-छोटे दाने या फफोले बनना
  • फफोलों से पानी या पस निकलना
  • त्वचा पर पपड़ी जमना
  • त्वचा का मोटा और काला पड़ना
  • लगातार खुजली रहना

सूखे एक्जीमा के लक्षण

  • त्वचा का रूखा होना
  • सफेद या भूरी पपड़ी बनना
  • बार-बार त्वचा फटना
  • खुजली अधिक होना

बहने वाले (तर) एक्जीमा के लक्षण

  • फफोलों से पानी निकलना
  • सूजन और लालिमा
  • जलन और दर्द
  • संक्रमण का खतरा बढ़ जाना

आयुर्वेद के अनुसार एक्जीमा क्यों होता है?

आयुर्वेद में एक्जीमा का मुख्य कारण त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) का असंतुलन माना गया है। जब ये दोष त्वचा, मांस और लसिका धातु को दूषित कर देते हैं, तब त्वचा रोग उत्पन्न होने लगते हैं।

एक्जीमा के प्रमुख कारण

1. विरुद्ध आहार का सेवन

ऐसे खाद्य पदार्थ जो एक-दूसरे के साथ नहीं खाने चाहिए।

जैसे:

  • दूध और मछली
  • दूध और नमकीन पदार्थ
  • दही और गर्म भोजन

2. भारी और अपाच्य भोजन

  • तली-भुनी चीजें
  • अत्यधिक मसालेदार भोजन
  • बार-बार भोजन करना

3. अधारणीय वेगों को रोकना

  • मल त्याग रोकना
  • मूत्र रोकना
  • छींक या अन्य प्राकृतिक वेगों को रोकना

4. अधिक भोजन करना

अपच और बदहजमी होने के बावजूद भोजन करते रहना।

5. कुछ विशेष खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन

  • दही
  • उड़द
  • गुड़
  • तिल
  • मूली
  • अधिक नमक
  • नया अनाज

आधुनिक चिकित्सा के अनुसार एक्जीमा के कारण

आधुनिक विज्ञान के अनुसार निम्न कारण एक्जीमा को बढ़ा सकते हैं:

  • एलर्जी
  • धूल-मिट्टी
  • रासायनिक पदार्थ
  • डिटर्जेंट
  • मधुमेह
  • गठिया
  • तनाव
  • त्वचा का बार-बार गीला रहना

कुछ व्यवसायों में भी इसकी संभावना अधिक रहती है:

  • धोबी
  • मिस्त्री
  • सफाई कर्मी
  • पानी या नमी वाले स्थानों पर काम करने वाले लोग

एक्जीमा के प्रकार

1. एलर्जिक कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस

किसी एलर्जी पैदा करने वाले पदार्थ के संपर्क में आने से।

2. सिबोरिक डर्मेटाइटिस

तेल ग्रंथियों वाले क्षेत्रों में होने वाला एक्जीमा।

3. न्यूरो डर्मेटाइटिस

तनाव और मानसिक कारणों से उत्पन्न।

4. फोटो एलर्जिक एक्जीमेटस डर्मेटाइटिस

धूप या प्रकाश के कारण होने वाला एक्जीमा।

5. स्टेसिस डर्मेटाइटिस

रक्त संचार की समस्या के कारण।

6. न्यूम्यूलर डर्मेटाइटिस

गोल आकार के चकत्तों के रूप में होने वाला एक्जीमा।


लक्षणों के आधार पर एक्जीमा के तीन चरण

1. तीव्र (Acute) एक्जीमा

यह रोग की प्रारंभिक अवस्था होती है।

लक्षण

  • त्वचा में सूजन
  • लालिमा
  • फफोले
  • पानी का रिसाव
  • जलन और दर्द
  • तीव्र खुजली

2. अर्ध-तीव्र (Subacute) एक्जीमा

समुचित उपचार न मिलने पर रोग इस अवस्था में पहुंच जाता है।

लक्षण

  • हल्की लालिमा
  • पपड़ी बनना
  • खुजली बढ़ जाना
  • पानी का निकलना बंद हो जाना

3. जीर्ण (Chronic) एक्जीमा

लंबे समय तक रहने वाला एक्जीमा।

लक्षण

  • त्वचा मोटी हो जाना
  • त्वचा का काला पड़ना
  • त्वचा पर शल्क (स्केल्स) बनना
  • लगातार खुजली रहना
  • बार-बार रोग का लौट आना

आयुर्वेद में एक्जीमा का उपचार

आयुर्वेद में एक्जीमा का उपचार केवल लक्षणों को दबाने के लिए नहीं बल्कि उसके मूल कारणों को दूर करने के लिए किया जाता है।

1. कारणों का परित्याग

सबसे पहले रोग को बढ़ाने वाले कारणों की पहचान कर उन्हें बंद करना चाहिए।

  • विरुद्ध आहार छोड़ें
  • अधिक नमक और मसाले कम करें
  • दही और तली-भुनी चीजों से परहेज करें
  • कब्ज न रहने दें

2. उचित आहार

क्या खाएं?

  • मूंग की दाल
  • हरी सब्जियां
  • पुराना गेहूं
  • जौ
  • त्रिफला युक्त आहार
  • नीम और गिलोय

क्या न खाएं?

  • दही
  • मछली
  • तला हुआ भोजन
  • फास्ट फूड
  • अत्यधिक मिठाई
  • अत्यधिक नमक

3. आंतरिक आयुर्वेदिक औषधियां

आयुर्वेदाचार्य की सलाह अनुसार निम्न औषधियों का उपयोग किया जा सकता है:

  • लघु मंजीष्ठादि क्वाथ
  • महामंजीष्ठादि क्वाथ
  • फलत्रिकादि क्वाथ
  • खदिरारिष्ट
  • महामंजीष्ठारिष्ट
  • आरोग्यवर्धिनी वटी
  • गंधक रसायन
  • रसमाणिक्य
  • गुडूची सत्व
  • पंचनिम्ब चूर्ण
  • निम्बादि चूर्ण
  • खदिर चूर्ण
  • पंचतिक्त घृत गुग्गुल
  • हरिद्रा खंड

नोट: इन औषधियों का सेवन योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से ही करें।


4. बाह्य प्रयोग (लगाने की औषधियां)

  • महामरिच्यादि तैल
  • गंधक तैल
  • तुवरक तैल
  • हरिद्रादि तैल
  • सिंदूरादि तैल
  • सिंदूरादि लेप
  • दशांग लेप
  • सर्जादि लेप
  • गंधक द्रुति
  • यशद मलहर
  • कासीसादि तैल

5. पंचकर्म चिकित्सा

यदि रोग पुराना और बार-बार होने वाला हो तो पंचकर्म विशेष लाभदायक माना जाता है।

विरेचन चिकित्सा

आयुर्वेद के अनुसार:

  • पंचतिक्त घृत से स्नेहन
  • चिकित्सकीय निगरानी में विरेचन कर्म
  • दोषों की शुद्धि

इससे रोग के मूल कारणों को दूर करने में सहायता मिल सकती है।


एक्जीमा से बचाव के उपाय

  • त्वचा को साफ और सूखा रखें।
  • अधिक रासायनिक उत्पादों का उपयोग न करें।
  • तनाव कम करें।
  • पर्याप्त पानी पिएं।
  • नियमित व्यायाम करें।
  • कब्ज न होने दें।
  • एलर्जी पैदा करने वाले पदार्थों से दूरी रखें।

निष्कर्ष

एक्जीमा (छाजन या पामा) एक जटिल लेकिन नियंत्रित किया जा सकने वाला त्वचा रोग है। आयुर्वेद इसे केवल त्वचा की समस्या नहीं मानता, बल्कि शरीर के अंदर मौजूद दोषों के असंतुलन का परिणाम मानता है। उचित आहार-विहार, दोषों की शुद्धि, आयुर्वेदिक औषधियों और पंचकर्म चिकित्सा के माध्यम से इस रोग को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और लंबे समय तक राहत प्राप्त की जा सकती है।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी औषधि या उपचार को अपनाने से पहले योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

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