पंचगव्य से रोग निवारण

Jun 11, 2026
आरोग्य साधन
पंचगव्य से रोग निवारण

पंचगव्य क्या है?

गोमूत्र, गोबर, दूध, दही तथा घी के एक निश्चित अनुपात के मिश्रण को पंचगव्य कहा जाता है। इसके सेवन से तन, मन तथा बुद्धि के विकार दूर होते हैं। आयु, बल और तेज की वृद्धि होती है तथा सात्विक भावों का विकास होता है।

धर्मसिन्धु के अनुसार पंचगव्य की मिश्रण विधि

  • गोमूत्र – 8 माशा

  • गोमय (गोबर रस) – 1 माशा

  • दूध – 1 माशा

  • दही – 10 माशा

  • घी – 8 माशा

  • कुशोदक – 4 माशा

बोधायन स्मृति के अनुसार पंचगव्य

  • गोघृत – 1 भाग

  • दही – 2 भाग

  • गोदुग्ध – 3 भाग

  • गोबर का रस – आधा भाग

आवश्यक सावधानियाँ

  • पंचगव्य की सभी सामग्री स्वस्थ एवं देशी गाय की होनी चाहिए।

  • गोबर को सीधे पंचगव्य में नहीं डाला जाता, बल्कि उसका रस उपयोग किया जाता है।

  • ताजे गोबर में साफ सूती कपड़ा दबाकर निचोड़ने से प्राप्त द्रव्य को गोबर रस कहा जाता है।

  • कुश मिश्रित गंगाजल को कुशोदक कहते हैं।

  • समस्त प्रायश्चित्तों में पंचगव्य सेवन भारतीय संस्कृति की प्राचीन परम्परा रही है।

  • यज्ञ, मंदिर निर्माण आदि धार्मिक कार्यों में भी पंचगव्य का विशेष महत्व माना गया है।


पंचामृत

पंचामृत का महत्व भी पंचगव्य के समान माना गया है। पूजा-अर्चना के अतिरिक्त इसका उपयोग रोग निवारण में भी किया जाता है।

पंचामृत की सामग्री

  • गाय का दूध

  • दही

  • घी

  • मधु

  • शर्करा

  • गंगाजल

  • तुलसी पत्र

लाभ

  • उच्च रक्तचाप में लाभकारी

  • हृदय रोगों से बचाव

  • स्नायु रोगों में सहायक

  • संक्रामक रोगों से सुरक्षा प्रदान करने वाला


सफेद दागों पर हितकारी योग (खाने के लिए)

सामग्री

  • बाकुची के शुद्ध किए बीज – 100 ग्राम

  • शुद्ध गेरु – 100 ग्राम

  • आंवला सार गंधक – 100 ग्राम

  • गोमूत्रक्षार – 100 ग्राम

बनाने की विधि

बाकुची के बीजों को गोमूत्र में रातभर भिगो दें। सुबह गोमूत्र बदलकर उबालें और छानकर बीज अलग कर लें।

आंवला सार गंधक को गाय के घी में धीमी आंच पर पिघला लें।

एक बर्तन में गोमूत्र लेकर उसके ऊपर साफ सूती कपड़ा बांध दें। पिघली हुई गंधक को कपड़े में छान लें। शेष गंधक को पानी से धोकर साफ कर लें।

अब गोमूत्रक्षार, शुद्ध गंधक, शुद्ध बाकुची बीज तथा शुद्ध गेरु को कूटकर खरल में अच्छी तरह घोट लें।

इसके बाद चने के आकार की गोलियां बनाकर सुखा लें। यदि गोलियां कुछ गीली रहें तो राख में सुरक्षित रखें।

उपयोग

  • 3-3 गोलियां पानी के साथ दिन में चार बार दें।

  • बच्चों के लिए आधी मात्रा पर्याप्त है।


सफेद दागों पर लगाने के लिए योग

सामग्री

  • बाकुची बीज – 150 ग्राम

  • गेरु – 50 ग्राम

  • गंधक – 50 ग्राम

  • मेंहदी के पत्ते – 40 ग्राम

  • चक्रमर्द – 150 ग्राम

  • हल्दी – 30 ग्राम

  • आक की जड़ का चूर्ण – 20 ग्राम

  • हरा कशीश – 10 ग्राम

  • गोमूत्र – आवश्यकतानुसार

बनाने की विधि

सभी पदार्थों को बारीक पीसकर गोमूत्र की सहायता से अच्छी तरह घोट लें और टिकियां बना लें।

उपयोग

टिकिया को गोमूत्र से धोकर सुबह-शाम गोमूत्र में घिसकर सफेद दागों पर लगाएं।

विशेष

खाने और लगाने वाली दोनों औषधियों का प्रयोग एक साथ किया जाता है।


गोमूत्र से रोग दूर कीजिए

स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य रक्षण तथा आँतों के विकारों के शमन हेतु आयुर्वेद में गोमूत्र को दिव्य औषधि माना गया है।

आधुनिक दृष्टि से गोमूत्र में पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, क्लोराइड, यूरिया, फॉस्फेट, अमोनिया, क्रिएटिन आदि विभिन्न पोषक क्षार पाए जाते हैं, जिनके कारण इसमें औषधीय गुण माने जाते हैं।


गोमूत्र सेवन विधि

रोग निवारण हेतु विभिन्न विधियों द्वारा गोमूत्र का सेवन किया जाता है, जिनमें—

  • पान करना

  • मालिश करना

  • पट्टी रखना

  • नस्य

  • एनिमा

  • गर्म सेंक

प्रमुख हैं।

पीने हेतु ताजा तथा मालिश हेतु 2-3 दिन पुराना गोमूत्र उत्तम माना गया है।

मात्रा

  • बच्चों को – 5 ग्राम

  • बड़ों को – 10 से 50 ग्राम (रोगानुसार)

दिन में दो बार सेवन करना चाहिए।

परहेज

  • मिर्च-मसाले

  • गरिष्ठ भोजन

  • तंबाकू

  • मादक पदार्थ

का त्याग आवश्यक है।

छानने की विधि

साफ सफेद सूती कपड़े की चार या आठ तह बनाकर गोमूत्र को छान लें और फिर उपयोग करें।


देशी गाय का महत्व

देशी गाय से अभिप्राय भारतीय नस्ल की गायों से है। माना जाता है कि देशी गाय के गोबर एवं गोमूत्र में वे गुण पाए जाते हैं जो विदेशी एवं संकर नस्लों में नहीं होते।

जंगल में चरने वाली गायें विभिन्न प्रकार की घास एवं जड़ी-बूटियाँ खाती हैं, जिससे उनके गोबर एवं गोमूत्र में औषधीय गुण अधिक माने जाते हैं।

गर्भवती एवं रोगी गाय का मूत्र उपयोग योग्य नहीं माना गया है। इसलिए बिना जनी बछिया का मूत्र सर्वोत्तम माना गया है।


रोगों में गोमूत्र के उपयोग

1. कब्ज, पेट फूलना एवं खट्टी डकार

3 तोला ताजा गोमूत्र में आधा ग्राम नमक मिलाकर पीने से पेट साफ होता है।

पेट में गैस की समस्या होने पर आधा कप गोमूत्र में काला नमक एवं नींबू रस मिलाकर सेवन करने की सलाह दी गई है।


2. पुराना जुकाम, नजला, दमा एवं उच्च रक्तचाप

चौथाई प्याली शुद्ध गोमूत्र में चौथाई चम्मच फूली फिटकरी मिलाकर सेवन करने का उल्लेख मिलता है।

दमा के रोगियों को छोटी बछिया का मूत्र लाभकारी बताया गया है।


3. अम्लपित्त (एसिडिटी)

सुबह गाय का प्रथम मूत्र एकत्र कर एक-दो घूंट से प्रारंभ करें और धीरे-धीरे पाँच-छः घूंट तक बढ़ाएं।

लगभग दो माह तक सेवन करने का उल्लेख मिलता है।


4. यकृत एवं प्लीहा वृद्धि

उपयोग

  1. 5 तोला गोमूत्र में एक चुटकी नमक मिलाकर।

  2. पुनर्नवा क्वाथ में समान मात्रा गोमूत्र मिलाकर।

  3. गोमूत्र में भीगे कपड़े से प्रभावित स्थान पर सिकाई।


5. मधुमेह (डायबिटीज)

प्रतिदिन 10 से 15 ग्राम बिना जनी बछिया का मूत्र सेवन करने का वर्णन मिलता है।


6. गले का कैंसर

30 मिलीलीटर गोमूत्र तथा सुपारी के बराबर ताजा गोबर मिलाकर छानकर सुबह-शाम सेवन करने का उल्लेख मिलता है।


7. पीलिया (पाण्डु रोग)

लगभग 200 मिलीलीटर गोमूत्र 15 दिन तक सेवन करने का वर्णन किया गया है।


8. जलोदर

50-50 ग्राम गोमूत्र में 2-2 ग्राम यवक्षार मिलाकर सेवन करने की सलाह दी गई है।

साथ में गोदुग्ध का सेवन भी हितकारी बताया गया है।


9. मोटापा

आधा गिलास पानी में—

  • 4 चम्मच गोमूत्र

  • 2 चम्मच शहद

  • 1 चम्मच नींबू रस

मिलाकर सेवन करने का उल्लेख है।


10. पेट के कृमि

चार चम्मच गोमूत्र एक सप्ताह तक सेवन करने का वर्णन मिलता है।

बच्चों के लिए आधी मात्रा पर्याप्त बताई गई है।


11. चर्म रोग (दाद, खाज, खुजली)

नीम-गिलोय क्वाथ के साथ गोमूत्र सेवन तथा गोमूत्र लेप का उल्लेख मिलता है।


12. जोड़ों का दर्द (संधिवात)

महारास्नादि क्वाथ के साथ गोमूत्र सेवन तथा गर्म गोमूत्र से सेक करने की सलाह दी गई है।


13. दांत दर्द एवं पायरिया

गोमूत्र से कुल्ला करने का उल्लेख मिलता है।

नियमित कुल्ला करने से पायरिया में लाभ बताया गया है।


14. आंखों का धुंधलापन, रतौंधी एवं कमजोर नजर

काली बछिया के मूत्र को तांबे के बर्तन में गर्म कर चौथाई भाग शेष रहने पर छानकर सुरक्षित रखा जाता है।

सुबह-शाम आंखों में डालने का वर्णन किया गया है।


15. प्रसव पीड़ा

50 मिलीलीटर गोमूत्र को गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर पिलाने से प्रसव पीड़ा कम होने का उल्लेख मिलता है।


गोमूत्र के अन्य उपयोग

  • घरों में शुद्धिकरण हेतु छिड़काव।

  • श्मशान से लौटने पर शुद्धिकरण।

  • धार्मिक कार्यों में उपयोग।

इसके जीवाणुनाशी गुणों के कारण ऐसी परंपराएँ प्रचलित रही हैं।


निष्कर्ष

इस प्रकार गोमूत्र एवं पंचगव्य का उपयोग भारतीय परंपरा एवं आयुर्वेद में स्वास्थ्य संरक्षण तथा विभिन्न रोगों के प्रबंधन हेतु वर्णित मिलता है। स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य रक्षण तथा रोगी को रोगों से बचाने के उद्देश्य से इसका उपयोग किया जाता रहा है। लोकमान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के वनवास काल में भ्राता भरत ने भी गोमूत्र का सेवन कर स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की थी।

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